तुम समंदर, मैं लहर

तुम समंदर, मैं लहर।

कभी सान्त समंदर में
कोलाहल सा मचाता हूं
मैं लहर हूँ, किनारों से टकराता हूँ
समुन्दर में लौट आता हूँ ।

कभी ज्वारभाटा बन के
आसमानों से बतियाता हूँ
तूफ़ान बन के कभी कभी
मैं कहर ढाता हूँ।

बन के बारिष कभी
मैं धरती पे छा जाता हूँ
नदी तलाब ताल तलैया बन के
समुन्दर मैं लौट आता हूँ।

बारिष, तूफ़ान ज्वारभाटा
है छनिक जो टिक नही पता
मेरा तेरा प्रेम अमर है
लहर समंदर का मेल अमर हैं।

जिबन के भटकाब का
तू ही अंत ठिकाना है
लहर उठे कितना भी ऊंचा
समंदर में मिल जाना है।

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